भारतीय सेना के जवानों के मर्म स्पर्शी और गगनभेदी नारों के साथ दाऊदी बोहरा समाज के युवा मेजर हमज़ा आरिफ को सैफी नगर इंदौर स्थित सैफी मस्जिद से भावभीनी विदाई दी गई। जनाजे की नमाज़ के पश्चात भारतीय सेना के प्रोटोकॉल के तहत देश की शान तिरंगे को जनाज़े पर ओढ़ाकर जब मेजर हमज़ा का पार्थिव शरीर मस्जिद से बाहर निकला तो हर खास और आम छोटे और बड़े हर धर्म जाति समुदाय के नागरिकों की आँखे गमजदा थी ।
सैफी नगर एवं इंदौर बोहरा समाज के लिए यह पहला अवसर था कि जब उन्होंने किसी जनाज़े में इस तरह से शिरकत की। अंतिम यात्रा का दृश्य भावविहल कर देने वाला था । सैफी मस्जिद से ईमली बाजार कब्रस्तान तक रस्ते में जिस किसी भी शख़्स ने भारतीय सेना के प्रोटोकॉल में मेजर हमज़ा आरिफ का अंतिम विदाई दृश्य देखा वो भावुक हो गया। किसी ने जनाज़े के हाथ जोड़े तो किसी ने देश भक्ति के नारे लगाए , किसी ने पुष्पांजलि अर्पित की तो किसी ने फुलों के हार मेजर हमज़ा की पार्थिव देह के पास रखी तस्वीर पर चढ़ाये ।
व्यापार व्यवसाय से जुड़ी क़ौम का कोई युवा जब देश सेवा करते हुए प्राणों की आहुति दे देता है तब यह पूरे समुदाय के लिए गर्व का विषय भी हो जाता है । ऐसे नाज़ुक समय पर देशप्रेम की भावना पूर्ण आवेग से हिलोरे लेती है और क़ौम का हर वाशिंदा फख्र की भावना से ओतप्रोत दिखाई देता है।
31 वर्षीय मेजर हमज़ा देश की सेना में 09 वर्ष की सेवा उपरांत पिछले दिनों राजस्थान में जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर एक सड़क दुर्घटना में शहीद हो गए । रात साढ़े बारह बजे के आसपास जब मेजर हमज़ा अपने दो साथियों के साथ ड्यूटी करके सेना की एस यू व्ही से लौट रहे थे तब उनका वाहन एक ऊंट से टकरा गया था। हादसे में ऊँट भी दिवंगत हो गया था जबकि मेजर हमज़ा के दो साथी गंभीर रूप से घायल हुए है जिनका उपचार चल रहा है।
जनाज़े को विदा करते समय मेजर हमज़ा के पिता केट के सेवानिवृत्त पर्चेस अधिकारी अबुली भाई की आंखों में पसरा सन्नाटा और सूनापन स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। तीन बहनो में एकमात्र भाई मेजर हम्ज़ा का इस तरह चले जाना निश्चित तौर पर परिवार पर गहरे वज्रपात से कम नहीं है।
अल्लाह तआला मरहूम मेजर हमज़ा को जन्नत के आला मक़ाम में बसाए और पूरे परिवार को हिम्मत और सब्र अता करे।
मुफद्दल हुसैन…..✍️
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